Feb 22, 2013 -    Comments Off on क्रान्ति सम्राट :डा0 गया प्रसाद कटियार (काव्य)

क्रान्ति सम्राट :डा0 गया प्रसाद कटियार (काव्य)

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क्रानित-सम्राट   डाक्टर गया प्रसाद  कटियार
रचयिता :  राम सिंह ‘प्रेमी
प्रकाशक  मुक्त चेतना समाज   हरदोर्इ

जिन्होंने करके अपनी दग्ध एषणा पुत्र, वित्त अरु लोक।
वरण कर लिया क्रानित का पंथ , दीप बन जले किया आलोक।। 1।।
जिन्हें थी प्रिय सामाजिक क्रानित ,रहे जो मेहनतकश के मीत।
जिन्होंने सुनी दीन की पीर , गरीबों के दिल का संगीत।। 2।।
किया नित खण्ड-खण्ड पाखण्ड, मिटाकर सकल अंधविश्वास।
राष्ट्र की आजादी के हेतु , रच गये जो नूतन इतिहास।। 3।।
रहे जो क्रानित पुरुष बेजोड़, चले नित रूढि़वाद-प्रतिकूल।
रूढि़वादी सब रचनाकार, इसलिये जिन्हें चुके हैं भूल।। 4।।
नीेंव में धँसी र्इंट की आज , महत्ता है लिखना सम्भाव्य।
अत: जो क्रानितवीर गुमनाम , समर्पित उनको ‘प्रेमी-काव्य।। 5।।

कवि की कलम से…

आज हम हजारों साल की राजनैतिक गुलामी के बाद आजाद राजनैतिक वातावरण में स्वतंत्रतापूर्वक रहने की बात करते हैं किन्तु बहुधा हम भूल चुके हैं कि भारत माता के कितने सपूतों ने आजादी की बलिवेदी पर अपने जीवन-सुमन चढ़ाये। उनकी आजादी के प्रति समर्पण की भावना, राष्ट्र-निष्ठा, लगन, क्रानित-धर्मिता, प्रामाणिक कर्तव्य परायणता, सच्चरित्रता और मानवता के प्रति संवेदनशीलता को हमने अपने जीवन में उतारने की बात तो दूर है, स्मरण करके स्वीकार करना भी अब तक सीख नहीं पाया है। संकुचित स्वार्थ-सिद्धि, सकीर्ण विचार-धारा, धन-पद के प्रति असाधरण तृष्णा, वर्ण-जाति-लिंग जन्य सामाजिक विषमता तथा कर्तव्यहीन अधिकारों की होड़ जैसे मानसिक विकारों और अंधविश्वासों ने ही हमारे राष्ट्रीय जीवन में यह जड़ता पैदा कर दी है।
अधिकांश ऐसा देखा जाता है कि जिन क्रानितवीरों ने अपने जीवन का क्षण-क्षण राष्ट्र-स्वातन्त्रय-यज्ञ में हवन किया आज उनके नाम नींव की र्इंट के समान विस्मृति के अधंकार में दिखार्इ तक नहीं पड़ते, जब कि ऐसे लोग जिन्होंने क्रानित का बिल्ला लगाकर अवसरवादी हवा के साथ मुड़कर परकीयों से जीवन की भिक्षा माँग ली, आज भारत की आजादी के ऐतिहासिक महल के श्रेष्ठतम कँगूरे बन गये हैं। यह सम्पूर्ण देश के प्रबुद्ध जन-मानस के लिए एक चिन्तन का विषय है।
आज मैं ऐसे ‘क्रानित-सम्राट से पाठकों का परिचय कराना चाहता हूँ जो निस्संदेह भारत की स्वतंत्रता की क्रानित के आन्दोलन में अद्वितीय त्याग, दृढ़ता, धैर्य एवं साहस तथा राष्ट्र-निष्ठा एवं मानवता की साकार मूर्ति रहे। उनका नाम था ‘क्रानित-सम्राट डा0 गया प्रसाद ‘कटियार।

जब मैंने मौलिक चिन्तक, लेखक एवं इतिहासकार श्री रोशनलाल जी गंगवार द्वारा लिखित डा0 गया प्रसाद कटियार का जीवन-वृत्त पढ़ा तो उनकी सहज क्रानित-निष्ठा और क्रानित-धर्मिता ने मेरे कवि-âदय को झकझोर दिया और फिर क्या था –
चेतना हुयी हमारी मुक्त,
हो गया कवि का सफल प्रयास।
लेखनी से झरते थे छन्द,
रच गया नवल क्रानित-इतिहास।
वस्तुत: डा0 गया प्रसाद का जन्म ही क्रानित का एक अंग रहा। फिर सामंती ऐश्वर्य में पलने के बावजूद प्रारमिभक पाठशाला से लेकर विवाहोपरान्त तक सामन्ती शोषण, उत्पीड़न, ऊँच-नीच, छुआछूत, सामाजिक विषमताओं तथा परम्परागत रूढि़वादी मान्यताओं और धार्मिक अंधविश्वासों के विरुद्ध क्रानित का बिगुल बजाना, सामन्तवाद और साम्राज्यवाद का विरोध करके समाजवाद और समतामूलक मानवतावादी सामाजिक व्यवस्था का समर्थन करना, कर्तव्यपरायण पत्नी रज्जों का स्वयं उनके ही द्वारा उनकी माँग का सिंदूर पोंछवाकर क्रानितदल के सदस्य बनकर क्रानित का अलख जगाना, छदम नाम-वेश से विभिन्न शहरों में दवाखाना खोलकर क्रानित संचालन करना, साण्डर्स हत्या-काण्ड के समय अपनी दूकान में भगतसिंह के केश-काटना, एसेम्बली में डाले जाने वाले विशेष बम, जिससे कोर्इ व्यकित मरे नहीं किन्तु आवाज बुलन्द हो, का स्वयं निर्माण करना गिरफ्तारी के बाद अण्डमान की सेल्युलर जेल में जीवित मौत की पाशविक यातनायें सहना, स्वतंत्र भारत में भी दो बार कैदी बनकर जेल जाना तथा भगतसिंह के जीवन-दर्शन और चन्द्रशेखर आजाद के कदमों पर चलते हुये 93 वर्ष का सतत संघर्षमय आदर्श जीवन जीना डा0 साहब को भारत की आजादी के इतिहास में सर्वथा एक अदभुत वैशिष्टय प्रदान करता है।

आज सरकार सामन्ती चका-चौंध में सत्ता के गलियारे में कुर्सी की हवस रखने वाले अवसरवादी, अपने भाषणों से जनता को बरगलाने वाले तथा प्रजातंत्र को परिवार-तंत्र का रूप देने वाले माननीय नेताओं और शासकों के लिए सतत प्रज्जवलित प्रकाश-स्तंभ है- ‘क्रानित-सम्राट।
कर्तव्यहीनता के अंधकार में अधिकारों की होड़ और उनका दुरुपोग करने वाले, घूसखोर, घोटालेबाज तथा संकुंचित स्वार्थ मेें अन्धे प्रशासकों के लिए ‘कानून आदमी के लिए है, न कि आदमी कानून के लिए का गगन-भेदी सिंहनाद है -‘क्रानित-सम्राट।
भाग्य, भगवान, पूनर्जन्म, स्वर्ग-नर्क, मोक्ष जैसे अंधविश्वासों, धर्म, जाति, वर्ण, लिंग या नस्ल पर आधारित विषमताओं में फँसे सम्पूर्ण जन-मानस के लिए मानसिक दासता की पारम्परिक बेडि़यों से मुकित दिलाने हेतु तर्क की कसौटी है- ‘क्रानित-सम्राट।
धर्म भीरु, धार्मिक दासता की बेडि़यों में जकड़ी हुयी, धर्मशास्त्रों में दासी, नर्क का द्वार, पाप का मूल, जड़ और अज्ञ जैसे अपशब्दों से अपमानित और समाज में मात्र भोग्यावस्तु-सी तिरकृत सम्पूर्ण नारी वर्ग के लिए जागरण-मंत्र एवं प्रेरणा-स्रोत है- ‘क्रानित-सम्राट।
शोषण, उत्पीड़न, अपमान, तिरस्कार, हीनभावना तथा अभावों से ग्रसित पशुवत जीवन जीते हुए भूख से तड़पते मेहनत-कश श्रमिकों और मजदूरों के लिए इन्कलाब है- ‘क्रानित-सम्राट।
भाववादी दर्शन के पोषक, कल्पनावादी पौराणिक कथाओं मेें अन्ध श्रद्धा से प्रेरित, ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़- मोड़कर जन-मानस को अतीत के सत्य से वंचित करने वाले तथा भाग्य, भगवान और पुनर्जन्म के काल्पनिक कथानकों के माध्यम से पाठकों में अंध विश्वास पैदा करने वाले रचनाकारों के लिए वैज्ञानिक साेंच की प्रामाणिक विचार-धारा है- ‘क्रानित-सम्राट।

सुधी, सुविज्ञ एवं चिन्तनशील पाठकों के लिए आज की विषमतावादी सामाजिक व्यवस्था जन्य अनेक सामाजिक समस्याओं का अनुभूत परिपक्व समाधान है- ‘क्रानित-सम्राट।
मैं अपनी जीवन संगिनी श्रीमती चन्दा के प्रति तो चिर आभार व्यक्त करता हूँ जिनकी सादगी, सरलता एवं सहजता का ही सुफल है मेरी काव्य-साधना अन्त में मैं अपने सभी सुधी पाठकों के हाथों में ‘क्रानित-सम्राट प्रस्तुत करते हुये विश्वास रखता हूँ कि मेरी रचना की सफलता के निष्पक्ष सटीक निर्णायक आप ही है। आपकी प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा में –

राम सिंह ‘प्रेमी सचिव मुक्त चेतना समाज
क्रानित-सम्राट : डा0 गया प्रसाद कटियार
सुमनान्जलि

दिया जिस जननी ने है जन्म, किया पोषण जिसने निष्काम।
सहे जिसने खुद कष्ट अनन्त, बनी सुत के हित जो सुखधाम।। 1।।
पिलाया जिसने अपना दूध , सिखाया चलना अगुली थाम।
तोतली बनकर सुत के साथ , बोलना सिखा दिया अविराम।। 2।।
सहज ममता की जो प्रतिमूर्ति, âदय में जिसके स्नेह ललाम।
धरा पर जो संसृति का मूल , करें उस माँ को प्रथम प्रणाम।। 3।।
आज चेतना हमारी मुक्त , हुआ उस माँ का सफल प्रयास।
लेखनी रचती नूतन छन्द , क्रानितवीरों का नव इतिहास।। 4।।
âदय-वीणा के झंकृत तार , राग के लगते भाव विचित्र।
कल्पना के पंखों पर बैठ ,लेखनी लगी खींचने चित्र।। 5।।
देख गोरों के अत्याचार ,हुआ जिसका मन-सुमन मलीन।
विचाराें से जो चिर स्वच्छन्द, âदय में जागे भाव नवीन।। 6।।
धुलाकर पत्नी का सिंन्दूर , सकल कौटुमिबक बन्धन तोड़।
पिता का सामन्ती ऐश्वर्य , मातु-ममता का उपवन छोड़।। 7।।
दिया जिसने सुख-वैभव त्याग ,âदय में आजादी की चाह।
भुलाकर निज जीवन का मोह ,चला जो सतत क्रानित की राह।। 8।।
क्रानित का पंथ कण्टकाकीर्ण , झेलने पड़ते नित संघर्ष।
लिया जिसने निज जीवन ढाल, उसी ढाँचे में सहज सहर्ष।। 9।।
क्रानित-पथ के संकट, अवरोध , विघ्न-बाधाओं को नित झेल।
हटाये सब झंझट प्रतिकूल , समझकर जिसने जीवन खेल।। 10।।
भगत सिंह थे जिनका आदर्श , चन्द्रशेखर थे जिनका साथ।
भगत का दर्शन जिनकी दृषिट, और शेखर थे जिनका हाथ।। 11।।

सहे जिसने जेलों में कष्ट , काट आजीवन कारावास।
नर्क दुखदायी सेल्युलर जेल, भयावह नित-पीड़ा-सहवास।। 12।।
कभी गोरों के सम्मुख माथ , झुकाना जिसे न आया रास
âदय में नित नूतन उत्साह , वेदना सहने का अभ्यास।। 13।।
बना जो राष्ट्र प्रेम की मूर्ति, सभी से मीठी वाणी बोल।
दिया जिसने जन-मानस-मध्य, सरस स्वातन्त्रय-सुधा-रस घोल।। 14।।
बन गया जिसका जीवन-वृत्त , सतत प्रज्ज्वलित दीप-उजियार।
प्रवाहित जिसकी जीवन-धार, धो रही मन के सकल विकार।। 15।।
नहीं थी जिसे ख्याति की चाह , नहीं थी पद की भी परवाह।
किन्तु निष्काम और नि:स्वार्थ , किया जिसने व्रत का निर्वाह।। 16।।
बन गया जो अनुपम आदर्श , नहीं है कोर्इ अन्य समान।
करूँ किससे समता, बेजोड़, वही उपमेय, वही उपमान।। 17।।
सहज जो बना क्रानित-सम्राट, लेखनी उसका लिखे चरित्र।
सरस सुमनाŒजलि गया प्रसाद , लीजिये ‘प्रेमी-भाव पवित्र।। 18।।
प्रथम सुमन

उदित लखकर प्राची में भानु , धरा पर हुआ नवल संचार।
हुये जड़-चेतना सब गतिमान , हुआ गतिशील जीव-संसार।। 1।।
चहकने लगे पखेरू वृन्द , नृत्य करते उपवन में मोर।
सब कहीं बाल-वृद्ध-नर-नारि ,करें सब नित्य-कर्म लख भोर।। 2।।
जहाँ का लगता अनुपम दृश्य , प्रकृति की छटा लगे अभिराम।
बगीचों में पुषिपत सब पुष्प , सुगंधित वातावरण ललाम।। 3।।
चतुर्दिक हरा धरा का रूप , âदय में भर देता उल्लास।
जहाँ की मिटटी में ही खेल , पनपता बच्चों में विश्वाास।। 4।।
जहाँ नर-नारी सब श्रमशील , कभी धरते न कुपथ पर पाँव।
प्रकृति का संरक्षण भरपूर , वही तो कहलाता है गाँव।। 5।।
वहाँ पर चीर धरा का वक्, कृषक पैदा करते हैं अन्न।
स्वयं सहकर अभाव की मार , जिन्दगी जीकर पूर्ण विपन्न।। 6।।
वहाँ पर मात्र साक्षर लोग ,अशिक्षा का जीवन में वास।
जिन्दगी बनी वहाँ पर रूढ़ ,और नित पलें अंध विश्वास।। 7।।
वहाँ मानव सामाजिक भेंद, ढो रहे बने लकीर-फकीर।
आज भी पकड़े जीवन-डोर ,वहाँ पर मुल्ला-पण्डा-पीर।। 8।।
अधिकतर वहाँ मानसिक दास ,खड़े हैं ऊँच-नीच के शैल।
बना दुस्साध्य विषमता-रोग , बढ़ाता छुआछूत का मैल।। 9।।
वहाँ पर सामाजिक अन्याय , और शोषण को पूरी छूट।
बन गया जीवन साधन-हीन , आपसी कलह, द्वेष अरु फूट।। 10।।
जिन्दगी में केवल अपमान , जी रहे पीकर विष का घूँट।
जानवर से बदतर दिन काट, गयी उत्पीड़न से कटि टूट।। 11।।
वहाँ पर हैं बहु संख्यक लोग , बसे मेहनतकश दीन-गरीब।
भोगते नारकीय सब भोग ,कोसते अपना भाग्य-नसीब।। 12।।
किन्तु उन गलियारों की धूल ,कभी कहती जीवन-सत्यार्थ।
मिले जो कभी न वह आदर्श , सहज जो अनुभव वही यथार्थ।। 13।।
जलाकर मुक्त चेतना-दीप , दूर कर देती मन में भ्रानित।
âदय में भरकर नव उत्साह , जगा देती जीवन में क्रानित।। 14।।
बसा गावों में भारत देश , गाँव में मेहनतकश का वास।
गाँव के गाये जाते गीत , गाँव का बलिदानी इतिहास।। 15।।
गाँव की वीर प्रसविनी मातु , जन्मती क्रानित वीर संतान।
गाँव के भगतसिंह सरदार , गाँव के ही शेखर यशवान।। 16।।
जिला है कानपुर विख्यात , जहाँ तहसील एक बिल्हौर।
निकट में ग्राम खजूरी खुर्द , एक थे जमींदार सिरमौर।। 17।।
नाम था महादीन कटियार , âदय में भरा राष्ट्र-अनुराग।
हुआ जब प्रथम मुकित-संग्राम, लिया उसमें बढ़-चढ़कर भाग।। 18।।
रहा उर में स्वतंत्रता-बीज, उगा जब मिला भावना-नीर।
किया गोरों का खुला विरोध , लगा बहने जब क्रानित-समीर।। 19।।
पुत्र थे महादीन के तीन , नाम मँझले का मौजी राम।
विवाहित हुये रहे जब बाल , नन्द रानी पत्नी गुण-धाम।। 20।।
सुखी थे महादीन सामन्त , बहू पाकर सुत के अनुकूल।
बीतने लगे वर्ष-प्रतिवर्ष, âदय में खिला कामना-फूल।। 21।।
हुये चिन्तातुर दुखी मलीन, âदय में भरा गहन अवसाद।
मनौती कर दी नि:संकोच,”गयाजी दीजै मुझे प्रसाद।। 22।।
पौत्र के बिना राजसी ठाठ, व्यर्थ लगता जीवन निस्सार।
गया में करूँ दान-मख-पुण्य, सुनूँ जब आँगन में किलकर।। 23।।
समय का चक्र सतत गतिशील , बीत कितने ही गये बसंत।
पिता के उर का वह सन्ताप , किन्तु पा सका न अब तक अंत।। 24।।
मनौती हुयी गया की व्यर्थ , दशायें चूँकि रहीं प्रतिकूल।
इसलिए बढ़ा अधिक उर-दाह , खिल सके नहीं कामना-फूल।। 25।।
हुआ जब सुत-वधु-युगल वयस्क ,बढ़ा तब पारस्परिक लगाव।
स्वस्थ तन-मन पाकर तारुण्य , अंकुरित हुये प्रेम के भाव।। 26।।
परस्पर आकर्षण का दौर , सहज मर्यादित मिलन-प्रसंग।
संयमित नित आहार-विहार, हो गया प्रकट प्रेम का रंग।। 27।।
बदलतीं ऋतुयें क्रमानुसार , हुआ जब बासन्ती अवसान।
नवागत हुयी भयावह ग्रीष्म, सभी को देने दु:ख महान।। 28।।
ग्रीष्म की तपन दे रही कष्ट , अवनि-अम्बर तपते ज्यों आग।
लोक जीवन शैली है नष्ट , चतुर्दिशि गूँज वेदना राग।। 29।।
पवन करता है तन को भस्म ,धरा लग रही मनौ मख-कुण्ड।
ताप से गले लौह-पाषाण, लगें रवि-किरणें ज्वाला-झुण्ड।। 30।।
व्यथित हैं आतप से जड़-जीव , फिर रहे सभी छोड़ निज धर्म।
देखकर नर दिनकर-आतंक , करें जीवन-रक्षा या कर्म।। 31।।
लतायें-वृक्ष उगलते आग , धूप से स्वयं डर रही छाव।
गा रहे विहग मरण का राग ,सुरक्षा का है कहीं न ठाँव।। 32।।
सूर्य ने सोख लिया सब नीर ,यथा कोर्इ शोषक सामन्त।
सूख सब गये नदी-नद-ताल, सब कहीं गूँजे स्वर ‘हा-हन्त।। 33।।
प्रकृति-सुन्दरि ने धरा कुरूप , लग रही विषम छिन्न-श्रंृगार।
गगन में उड़े धुआँसी धूल ,धधकती धरा यथा अंगार।। 34।।
तप रहा है अम्बर के मध्य , निरंकुश शासक सा दिन-कंत।
पथिक के लिए बने हैं काल , बवण्डर-लूक यथा सामंत।। 35।।
जल गये आज कल्पना पंख , प्रेम का बंद हो गया द्वार।
वेदना-नदी बनी निस्सीम , असम्भव चकवे का अभिसार।। 36।।
झेलते नभ-थल-जल चर पीर, दुसह थी जब आतप की मार।
उस समय सुख-चर्चा का केन्द्र ,बन गया महादीन परिवार।। 37।।
रही सन उनीस सौ की ग्रीष्म , हुआ जब बीस जून का भोर।
खजूरी खुर्द ग्राम के मध्य , उठी अनुपम आनन्द-हिलोर।। 38।।
बाल-रवि की किरणों के साथ ,गाँव का बदल गया सब रूप।
नन्दरानी की सुफला कोख ,हुआ बालक उत्पन्न अनूप।। 39।।
पवन-पंखों पर चढ़ सन्देश , गाँव में पहुँचा सबके पास।
नाचने लगे सभी मन-मोर ,तपन बन गयी सुखद मधुमास।। 40।।
खिल उठे सबके âदय-प्रसून ,मच गयी सारे घर में धूम।
मस्त थे महादीन बेजोड़, खुशी में उठा गाँव सब झूम।। 41।।
पौत्र का जन्म सुखद मन-मोद, तुरत आ गयी मनौती याद।
थिरकते महादीन के पाँव ,पुकारा कहकर ”गया-प्रसाद।। 42।।
हो गया नाम करण तत्काल , द्वार पर होता गाना-नृत्य।
सभी परिजन-पुरजन में हर्ष , स्वयं सब साज सजाते भृत्य।। 43।।
बज रहे द्वारे-द्वारे ढोल , सभी के उर उमगा आâलाद।
परस्पर चला बात का दौर , क्षेत्र में फैल गया संवाद।। 44।।
आ रहे महादीन के द्वार , बधार्इ देने लोग तमाम।
सभी को बाँट रहे मिष्ठान ,प्रफुलिलत मन में मौजीराम।। 45।।
खुशी हैं महादीन सामन्त ,खिल उठा उनका âदय-सरोज।
ले रहे दान-पुण्य का लाभ ,दे रहे सबको घर पर भोज।। 46।।
दीन दुखियों की आयी बाढ़ , लग गयी द्वारे भीड़ अपार।
प्रफुलिलत पाकर पहला पौत्र , âदय से हुये अतीव उदार।। 47।।
रहे जो शोषित-वंचित-दीन , दिया सबको ही वस्त्र-अनाज।
कर रही जनता ‘जय-जयकार ,’धन्य हो धन्य गरीब-नवाज।। 48।।
मच गयी चहल-पहल चहुँ ओर ,सभी के उर उफनाया हर्ष।
झूमकर दुआ दे रहे लोग ,”जिये नवजात पुत्र सौ वर्ष।। 49।।
सतत गतिषील समय का चक्र ,ग्रीश्म का हुआ क्रमिक अवसान ।
सजल पावस आगमन तुरन्त , प्रकृति ने धारे नव परिधान।। 50।।
नवेली सजी रूप की राशि ,सघन घन-अलकावलि सुखसार।
इन्द्र का धनुष मनौ उर-माल ,पयोधर सुघर स्रवित पय-धार।। 51।।
गगन में उमड़े घन घनघोर , बिखरते पाकर पवन-प्रवाह।
भुलाकर ज्यों जीवन का लक्ष्य , तरुण हैं घूम रहे गुमराह।। 52।।
बदलते बादल क्षण-क्षण रंग , कभी हैं श्वेत, कभी तो श्याम।
यथा दल बदलू अवसर देख , दूसरे दल को लेते थाम।। 53।।
गगन में गरज रहे हैं मेघ , प्रकृति भी बजा रही ज्यों ढोल।
दादुरों की ध्वनि चारों ओर , रही जन्मोत्सव पर जय बोल।। 54।।
देखकर पानी की भरमार , अंकुरित हुयी सब कहीं घास।
प्रफुलिलत बरखा-रानी संग , धरा-उर ज्यों उपजा उल्लास।। 55।।
मिला शिशु को दादी का स्नेह, और बाबा का अनुपम प्यार।
मातु की ममता मिली अकूत, पिता का स्वप्न हुआ साकार।। 56।।
कभी रोदन, जब-कब किलकार , भरा खुशियों से था प्रासाद।
कभी इस गोद, कभी उस गोद , खेलते रहते गया प्रसाद।। 57।।
लगे बढ़ने शशि-कला समान , देखकर सुख पाता परिवार।
दौड़ते फिरते आँगन मध्य , कभी कर जाते घर को पार।। 58।।
रात में बाबा जी के पास ,लेट कर सुने कहानी रोज।
सुनाते महादीन भी नित्य ,पुरानी घटनाओं को खोज।। 59।।
सुनाया स्वतंत्रता-संग्राम ,प्रथम का जिस दिन सारा हाल।
बीच में पड़ा सजग शिशु बोल , तोतली बानी में तत्काल।। 60।।
”छुनो बाबा तहता हूँ थीत , छंदथित तलते छतल छमाज।
प्लतिधा तलता तुमछे छत्य , मिता दूँदा मैं दोला लाज।। 61।।
सुना शिशु का अदभुत संवाद , हो गये महादीन तब मौन।
विलक्षण प्रतिभा से सम्पन्न , बनेगा शिशु क्या, जाने कौन?। 62।।
जान सकता भविष्य की कौन , हो गया दादी का निर्वाण।
और उनके कुछ ही दिन बाद , हुये बाबा जी भी निष्प्राण।। 63।।
खो गया दादी का वह प्यार ,हुयी बाबा की छाया दूर।
विवश हो बालक गया प्रसाद ,दुखी, शोकाकुल थे भरपूर।। 64।।
रह गया पितु-संरक्षण मात्र ,और माँ की ममता का नीर।
समय के साथ गये दुख भूल ,हो गयी क्षीण वेदना-पीर।। 65।।
पितृ-देहावसान के बाद , आ पड़ा कंधे पूरा भार।
बन गये मालिक मौजीराम , प्राप्त कर सामन्ती अधिकार।। 66।।
बुलाये अपने मित्र विशेष ,सभी के सुने स्वतंत्र विचार।
मनन-चिन्तन के ही उपरान्त ,किया निशिचत भावी व्यवहार।। 67।।
देश में था गोरों का राज , चढ़ा था सब पर शासन-भूत।
क्षेत्र के रहे प्रमुख सामन्त , इसलिये था सम्मान अकूत।। 68।।
लगा रहता था जमघट रोज , दीन-दुखियों का उनके द्वार।
कठिन होती मालिक से भेंट , खड़ा फाटक पर चौकीदार।। 69।।
एक तो अंग्रेजों का जाल , दूसरे सामन्ती फटकार।
गरीबों पर यह दुसह दुराज , ढा रहा शोषण-अत्याचार।। 70।।
सह रहे भीषण कष्ट अपार ,श्रमिक, मेहनतकश, दुखी, गरीब।
जिन्दगी पशु से बदतर काट , कोसते निज प्रारब्ध-नसीब।। 71।।
पी रहे अपमानों के घूँट , विषमता दे न कभी विश्राम।
भोगते पूर्व जन्म के कर्म — , फलों के ही घातक परिणाम।। 72।।
अशिक्षित, अपढ़, दलित, मजदूर ,पुरानी परम्परा के दास।
प्रकड़ कर पुरखों की ही टेक , मानते वही अंध विश्वास।। 73।।
किसानों, मजदूरों का झुण्ड ,दीन-दुखियों की दशा मलीन।
देखकर कर हालत गया प्रसाद , कभी तो हो जाते गमगीन।। 74।।
गाँव में ऊँच-नीच का रोग , बाल-उर में भर देता खेद।
खेलते सब बच्चों के साथ , भुलाकर छुआछूत का भेद।। 75।।
सभी बच्चों से करते प्रेम , âदय में सबके लिए लगाव।
सभी से समता का व्यवहार ,परस्पर समरसता का भाव।। 76।।
हुयी जब सात वर्ष की आयु , पुत्र को लेकर मौजीराम।
सुशिक्षित करने हित तत्काल ,लिखाया विधालय में नाम।। 77।।
हुआ शिक्षा का क्रम प्रारम्भ , सहज ही पाया अक्षर ज्ञान।
अन्य छात्रों से सहज लगाव ,सहज सब गुरुजन प्रति सम्मान।। 78।।
रहे जो पढ़ते छात्र अछूत, बैठते अलग पटिटयाँ डाल।
लगे जब उन बच्चों को प्यास , तृषा से हो जाते बेहाल।। 79।।
स्वयं यदि कर लेते जल-पान, तुरत गुरुजन हो जाते क्रुद्ध।
पिटार्इ कर देते तत्काल , और कहते ”जल हुआ अशुद्ध।। 80।।
देखकर विधालय का दृश्य ,भर गया उर में अधिक विषाद।
एक दिन गुरु से सहज, विनम्र ,भाव से बोले गया प्रसाद।। 81।।
”आप हैं मेरे गुरुजन पूज्य , करूँ मैं एक विनय करबद्ध।
उठ रहे भीतर प्रश्न अनेक ,जानने उत्तर को सन्नद्ध।। 82।।
यहाँ पर देख विषम व्यवहार , बाल मन अतिशय हुआ अधीर।
भावना-ज्वार उठा उर-सिन्धु , वेदना की तरंग दे पीर।। 83।।
सभी विधा मनिदर के छात्र ,एक ही साथ पढ़ाते आप।
एक सा हुआ सभी का जन्म ,एक से ही हैं माता-बाप।। 84।।
एक से तन-मन-उर-मसितष्क ,एक सा ही बहता है खून।
एक सी भूख, एक सी प्यास ,एक सा ही पढ़ते मजमून।। 85।।
एक सा खाना-पीना नित्य ,एक सा ही त्यागें मल-मूत्र।
एक सा दर्द, एक से रोग ,एक से ही सब जीवन-सूत्र।। 86।।
एक सी सबकी मानव योनि ,एक से ही हम सब इन्सान।
एक ही सबकी मानव जाति ,क्यों नहीं फिर सब एक समान।। 87।।
बता दें गुरुवर वह कानून ,बने जिससे कुछ लोग अछूत।
बनाया किसने वह सिद्धान्त ,बने जिससे कुछ पावन पूत।। 88।।
परस्पर सामाजिक बिखराव , मूल में जिसके विघटन मंत्र।
दासता का यह असली मूल , आज हम इसीलिए परतंत्र।। 89।।
धृष्टता कीजै गुरुवर माफ ,खेलाते हम कुत्तों को गोद।
सुलाते बिस्तर पर भी लोग ,साथ में अपने संग समोद।। 90।।
जानवर से भी मानव नीच ,बतायें श्रीमन इसका मर्म।
सिखाते हो मानवता-पाठ ,यही है क्या मानव का धर्म।। 91।।
प्रश्न सुन बालक के गम्भीर , तुरत रह गये गुरुजी दंग।
सोचने लगे ठोंक निज माथ ,हो गये मन के सब भ्रम भंग।। 92।।
गुरू ने कहकर- ”गया प्रसाद ,अभी तुम हो अज्ञानी बाल।
धर्म का मर्म समझना किलष्ट ,दिये प्रश्नों के उत्त्र टाल।। 93।।
सुन रहे थे कक्षा के छात्र, मिल गया सबको सच्चा ज्ञान।
हुये हर्षित पाकर शुभ मित्र ,दिया सबने पूरा सम्मान।। 94।।
उसी दिन से छात्रों के मध्य ,’गया जी पड़ा आपका नाम।
परस्पर बढ़ा सभी से प्रेम ,सभी के लिए बने गुण-ग्राम।। 95।।
बालपन से ही चिन्तनशील ,कभी भाया न राजसी ठाठ।
भुलाकर सामन्ती ऐश्वर्य , पढ़ा था सदा सादगी-पाठ।। 96।।
उसी दिन गुरु ने किया विचार , ”छात्र के प्रश्न परम गम्भीर।
âदय में होता है आभास , हरेगा वह दलितों की पीर।। 97।।
धरा पर होनहार जो वृक्ष ,सदा हों उनके चिकने पात।
पूर्व में ही देते आभास , झेलते सारे झंझावात।। 98।।
मुझे लगता भविष्य में छात्र , नकारेगा र्इश्वर असितत्व।
मिटाकर पूर्वजन्म-प्रारब्ध , बनेगा क्रानित-बीज व्यकितत्व।। 99।।
गुरुजी गये पिता के पास ,बताया कक्षा का वृतान्त।
”आपके बेटे का व्यवहार , कर रह मेरा चित्त अशान्त।। 100।।
रखे मुझसे जो प्रश्न अनेक , सभी बच्चों के सम्मुख आज।
नहीं उनके उत्तर आसान , आपको बतलाता सब राज।। 101।।
एक दिन वह होगा आरूढ़, मिटाने कुल धार्मिक विश्वास।
हटाकर ऊँच-नीच का भेद ,करेगा समता का एहसास।। 102।।
धर्म के जो हैं मूल प्रतीक ,आप-हमको जिनपर विश्वास।
उन सभी पर करता है प्रश्न, बताता उन्हें अंध विश्वास।। 103।।
व्यवस्था सामाजिक प्राचीन , भोगते हैं सुख जिसका आप।
कहेगा सामाजिक अन्याय ,गरीबों का शोषण है पाप।। 104।।
जगा देगा मेहनतकश वर्ग ,करेगा वह कुछ ऐसे काम।
सफेदी में लग जाये दाग , आप भी होंगे तब बदनाम।। 105।।
निवेदन है इतना ही मात्र ,नहीं कुछ कर सकता हूँ और।
चाहता सुधर जाय तब पुत्र ,कीजिए उस पर थोड़ा गौर।। 106।।
गुरू से बोले मौजीराम ,”आपका लगता कथन सटीक।
करूँगा मैं अब सभी प्रयास , पकड़ ले बेटा सीधी लीक।। 107।।
गुरू जी चले गये तत्काल ,हो गये चिनितत मौजीराम।
”किस तरह सुधरेगा अब पुत्र?, सोंचते रहते आठोयाम।। 108।।
उन दिनों चलता रीति-रिवाज़ ,पिता-माता की पहली चाह।
नहीं शिक्षा की उनकी फिक्र ,करें बचपन में सभी विवाह।। 109।।
नहीं रखते थे इसका ध्यान ,कि होवे बहू पुत्र के योग्य।
सोच था मात्र बहू का बाप , मिले सम्मानित, धनी, सुयोग्य।। 110।।
कानपुर जनपद के ही मध्य, बसा शिवराजपुरी है ग्राम।
वहीं पर जमींदार थे एक , बहुत सम्पन्न, बहुत सरनाम।। 111।।
चाहते थे सुखदेव प्रसाद, करे कन्या के पीले हाथ।
लाडि़ली रज्जो का तब व्याह , कर दिया तुरत गयाजी साथ।। 112।।
गयाजी ग्यारह वर्षी बाल , सात वर्षीया रज्जो-संग।
हुआ खर्चीला व्याह प्रसिद्ध , जम गया सामन्तों का रंग।। 113।।
प्राथमिक शिक्षा के उपरान्त , पिता ने दिया कानपुर भेज।
शहर में ज्ञान मिलेगा श्रेष्ठ ,इसलिए किया न कुछ परहेज।। 114।।
गयाजी करते शिक्षा प्राप्त ,और लेते कुछ समय निकाल।
उसी में नित पढ़कर अखबार ,जान लेते थे सारा हाल।। 115।।
पाठयक्रम के भी कुछ अतिरिक्त , पुस्तकें पढ़ने का था चाव।
क्रानित वीरों के पढ़े चरित्र , क्रानित का मन पर पड़ा प्रभाव।। 116।।
कर लिया जब मैटि्रक उत्तीर्ण ,कोर्स फिर पी0एम0पी0 का पास।
बन गये योग्य डाक्टर आप , किया तब आकर ग्राम-निवास।। 117।।
दवाखना घर पर ही खोल , लगे करने विधिवत अभ्यास।
सभी रोगी होते सन्तुष्ट , सभी से करें हास-परिहास।। 118।।
रोगियों के हर लेते रोग ,गरीबों के हमदर्द महान।
दवाखाने में लगती भीड़ ,दलित-शोषित-मजदूर-किसान।। 119।।
सभी से हेल-मेल का भाव ,करें समता मूलक व्यवहार।
अछूतों-दीनों-दुखियों हेतु , गयाजी बने दया साकार।। 120।।
चन्द दिन में ही हुए प्रसिद्ध , क्षेत्र में कारण रहा विशेष।
सभी के प्रति था âदय उदार , मिटाकर भेद-प्रवृतित अशेष।। 121।।
व्याह करके भी मौजीराम ,मौज में हुये न, करें विचार।
गया जी पर कुछ पड़ा न फर्क ,हरकतें वहीं, न हुआ सुधार।। 122।।
हुये मन में सहसा भयभीत–,”सुधारें किमि बालक बिगड़ैल।
कहीं गोरों का बढ़ै न कोप ,गिरे जो आकर मुझपर शैल।। 123।।
अहर्निशि सोचें मौजीराम ,प्रबल चिन्ता के हुए शिकार।
‘हो गयी यदि बेटे को जेल , कलंकित होगा मम परिवार।। 124।।
विचारा शासन-बेड़ी पूर्व, डाल दूँ अगर गृहस्थी भार।
बढ़ेगा जब पत्नी से मोह , पुत्र में होगा स्वत: सुधार।। 125।।
इसलिए गौने की तिथि पूछ, भेजकर समधी को संदेश।
बहू रज्जो आयी ससुराल , देर उसमें न हुयी थी लेश।। 126।।
बहू थी रूप रंग में ठीक ,किया जब उसने महल-प्रवेश।
यथा प्राची दिशि संध्याकाल ,गगन में उदित हुआ राकेश।। 127।।
रहीं रज्जो अनपढ़, अल्पज्ञ ,अशिक्षित किन्तु शिष्ट व्यवहार।
सादगी, सहज सरलता युक्त ,शीलता, समरसता साकार।। 128।।
श्वसुर में पूज्य पिता का रूप , सास से मातु समान लगाव।
परिजनाें का समुचित सम्मान , स्वपति में परमेश्वर का भाव।। 129।।
समय का करतीं सदउपयोग , समझती पर-सेवा ही पुण्य।
सौम्यता की रज्जो प्रतिमूर्ति , गृहस्थी कार्यों में नैपुण्य।। 130।।
समूचा राजमहल सानन्द ,पुकारे रज्जो सदगुण-खान।
‘बहू तो सचमुच लक्ष्मी रूप ,नारियाँ करती थीं गुण-गान।। 131।।
गया जी रज्जो जी के संग ,गृहस्थी चला रहे सानन्द।
किन्तु उनके उर क्रानित-प्रवाह ,पड़ा था नहीं तनिक भी मन्द।। 132।।
कथन था– ”कभी विवेकी व्यकित ,नहीं सिद्धान्त सकेगा छोड़।
जगत में है न किसी में शकित ,सके जो क्रानित-धार को मोड़।। 133।।

द्वितीय सुमन

प्रकृति की गति परिवर्तनशील ,आज तक सका न कोर्इ जान।
समझने का सब करें प्रयत्न ,लगा पाते केवल अनुमान।। 1।।
हुयी कवि-कोविद-वाणी मौन , एक भी खोल न पाये भेद।
सभी दर्शन-मत बोलें भिन्न, कह रहे नेति-नेति हैं वेद।। 2।।
प्रकृति की भाषा नदी-पहाड़, पेड़-पौधे हैं भाव-प्रतीक।
धरा पर देते नित सन्देश , प्रकृति के सारे नियम सटीक।। 3।।
उदित हो जब नित बाल-पतंग ,करें अगवानी हिमधर-श्रंृग।
बुझाने तृषित धरा की प्यास , गलाता रहता अपना अंग।। 4।।
बाल-रवि की किरणों का झुण्ड , थिरकते शिखरों पर चहुँओर।
चेतना भर देता है नव्य , नित्य जड़ चेतन भाव-विभोर।। 5।।
नीलिमा नभ की निज प्रतिबिम्ब , डाल देती जब अपनी छाप।
मनौ नीलाभ-श्वेत पट ओढ़, प्रकृति-सुन्दरि सोती चुपचाप।। 6।।
शिखर के झरनों का संगीत ,सुनाता रहता जीवन-मंत्र।
हमारा जीवन नित गतिशील ,निरन्तर हो निर्बन्ध, स्वतंत्र।। 7।।
सहन जब हो न ग्रीष्म की दाह ,अवनि-अम्बर का करने त्राण।
स्वयं पिघलाकर अपनी देह , भरे पर्वत सबमें नव प्राण।। 8।।
झरे बरसात मूसलाघार , सहे हिमधर वर्षा आघात।
यथा कोर्इ साधक तत्लीन , दे रहा विपदाआें को मात।। 9।।
सहन कर लेता है तूफान , खड़ा रहकर पर्वत चुपचाप।
यथा कोर्इ भारत प्रणवीर ,लक्ष्य हित सहलेता संताप।। 10।।
झेलता है नित झंझावात ,यातना-दर्द-वेदना पीर।
ध्येयहित तन होता बलिदान, किन्तु मन होता नहीं अधीर।। 11।।
एकत्रित होकर जब जलबिन्दु, बने जमने पर दृढ़ हिमखण्ड।
प्रकृति-संकेतों का संदेश , संगठन में है शकित अखण्ड।। 12।।
इस तरह पल-पल पर संकेत , प्रकृति से मिलते बिना प्रयास।
किन्तु हम मानव रहित विवेक , बन गये अन्ध मानसिक दास।। 13।।
प्रकृति के संदेशों से दूर , इसलिए भरा अन्ध विश्वास।
विखणिडत हुआ समूचा देश , र्इष्र्या-द्वेष-घृणा का वास।। 14।।
धधकती यहाँ फूट की आग , जल गया प्रेम-आपसी मेल।
बँटा टुकड़ों में पूर्ण समाज , इसलिए रहे दासता झेल।। 15।।
सहज जीवन गाड़ी की राह , स्वत: मुड़ती है कभी-कभार।
यथा जब-कब सावन के मास , जेठ की उड़ती धूल अपार।। 16।।
शारदी राका में रजनीश , याकि ढक लेती हो घन-माल।
बसन्ती सरस समय में याकि ,रूक्ष पतझर की हो स्वर-ताल।। 17।।
देश में ऊँच-नीच का रोग ,परस्पर छूआछूत का भाव।
हुआ बिखराव आज हर ठौर ,नहीं है पारस्परिक लगाव।। 18।।
गाँव में बहुसंख्यक मजदूर ,अकेला सामन्ती परिवार।
गरीबों-दीनों-दुखियों हेतु ,सभी कुछ सामन्ती सरकार।। 19।।
कमेराें का बस इतना सोंच–,”करें मेहनत खेतों में खूब।
पसीना बहा-बहा दिन रात , जोतकर खेत निकालें दूब।। 20।।
सहन कर वर्षा-ठण्डक-धूप ,करें मेहनत से जो उत्पन्न।
उसे ले जाकर मालिक द्वार ,सभी भर दें कोठार में अन्न।। 21।।
कभी तो मिट जाती है भूख , कभी तो रहते खाली पेट।
पहनते फटे-पुराने वस्त्र, धरा पर ही जाते हैं लेट।। 22।।
झोपड़ी जर्जर रोशन दान ,पड़ी उसमें ही टूटी खाट।
पानकर अपमानों का घूँट ,जिन्दगी सभी रहे हैं काट।। 23।।
नारियों-बच्चोें का बदहाल , सहन करते शोषण की मार।
भोगते निज कर्मों का भोग , इसलिए करें न कुछ प्रतिकार।। 24।।
सहें सामन्ती अत्याचार ,मानकर पूर्व जन्म का भोग।
‘अमिट है ब्रह्राा का यह लेख, अन्ध विश्वास बन गया रोग।। 25।।
उसी ने हमें बनाया नीच , बताया सेवा करना धर्म।
उच्च का करें सदा सम्मान, यही बस है जीवन का मर्म।। 26।।
देश हो स्वतंत्र या परतंत्र , हमारा जीवन सदा समान।
जिन्दगी कष्टों का पर्याय , रात-दिन सहें पीर-अपमान।। 27।।
कमेरों का यह पूरा सोंच ,अशिक्षा का ही है परिणाम।
अशिक्षित, अनपढ़ और गवाँर ,आज भी झेलें कष्ट तमाम।। 28।।
गाँव की दशा देख दयनीय ,गयाजी ने था किया विचार।
अचानक राजनीति का भूत , हुआ उनके मसितष्क सवार।। 29।।
रहा बहुचर्चित ‘आर्य-समाज , बैठकों का सुनियोजित ढंग।
गयाजी उसके बने सदस्य ,चढ़ गया आर्य समाजी रंग।। 30।।
पकड़कर राजनीति की राह , हुआ सामाजिक गति-विधि-ज्ञान।
कमेरों में ओषधि को बाँट ,जगाने लगे आत्म-सम्मान।। 31।।
गयाजी के समान था योग्य , नहीं उस समय गाँव में व्यकित।
तर्क करने में डरते लोग, तर्क की उनमें अदभुत-शकित।। 32।।
बैठकर सब दलितों के मध्य , प्रेम से करते खुलकर बात।
सुशिक्षित हों किसान-मजदूर, यही सोंचा करते दिन-रात।। 33।।
बैठना-उठना सबके साथ , सभी के साथ करें जल-पान।
बाँट लेते सबका दुख-दर्द, गले मिलकर देते सम्मान।। 34।।
मिटाकर सब सामाजिक भेद , कर रहे दलितों के भ्रम दूर।
गरीबों का करने उदधार , उठाया था बीड़ा भरपूर।। 35।।
गयाजी को दलितों के बीच , देख दुख पाते लोग तमाम।
करें आपस में साेंच-विचार–,’नहीं अच्छा इसका परिणाम।। 36।।
हुआ जब नहीं उन्हें सन्तोष ,गये मिलने डाक्टर के पास।
बोलने लगे एक थे विप्र , âदय में भरा अन्ध विश्वास।। 37।।
”अरे! तुम जमींदार के पुत्र , डाक्टर पढ़े-लिखे हो व्यकित।
तुम्हारा सम्मानित परिवार , तुम्हारे पास बुद्धि-धन-शकित।। 38।।
तुम्हारी चौखट पर जो रोज , रगड़ते नाक, उठाते लीद।
बैठकर उन नीचों के बीच , आज तुम मना रहे हो र्इद।। 39।।
लग गर्इ तुम्हें शहर की छूत , अभी तुम अनुभवहीन जवान।
डाक्टर बन जाने से मात्र ,नहीं होता जीवन का ज्ञान।। 40।।
सीख कर अंग्रेजी का पाठ ,हो गयी बुद्धि तुम्हारी भ्रष्ट।
भुलाकर पुरखों का ऐश्वर्य ,कर रहे हो निज जीवन नष्ट।। 41।।
तुम्हारे दादा-दादी नित्य ,किया करते थे पूजा-पाठ।
ब्राह्राणों को देकर नित भोज ,भोगते रहे राजसी ठाठ।। 42।।
तुम्हारे पितु भी मौजीराम ,खुशी रखते हैं विप्र-समाज।
विप्र का पाकर आशीर्वाद ,क्षेत्र में सम्मानित हैं आज।। 43।।
किन्तु तुम कैसे उनके पुत्र, मिटाते ऊँच-नीच का भाव।
बताते छुआछूत है रोग , इसी से सामाजिक बिखराव।। 44।।
जगाकर मेहनतकश मजदूर , सिखाते हो सब मनुज समान।
जाग यदि गये कमेरे लोग , हम सभी को हो कष्ट महान।। 45।।
बिना मजदूरों के सब काम , ठप्प हो जायेंगे सब ठौर।
बड़प्पन होगा विकल-तबाह, करो मेरी बातों पर गौर।। 46।।
कह रहे धर्म शास्त्र के लेख , रचे हैं वर्ण ब्रह्रा ने चार।
भोगते निज कर्मों का भोग , बना है पूर्व जन्म आधार।। 47।।
ब्राह्राण सबसे उत्तम श्रेष्ठ , निम्नतर उससे क्षत्रिय लोग।
वैश्य का है तृतीय सोपान , शूद्र-पिछड़ों को अन्त्यज-भोग।। 48।।
विप्र की बात मान लो सत्य , शूद्र हैं शूद्र, नीच हैं नीच।
रहे जो सदा तुम्हारे दास , बैठते हो तुम उनके बीच।। 49।।
विप्र की सुनकर उल्टी बात , गयाजी बोल उठे तत्काल।
”सदा से परजीवी तुम विप्र, रचा तुमने ही सारा जाल।। 50।।
रचे तुमने ही सारे शास्त्र , लिखे तुमने ही सारे ग्रन्थ।
तुम्हीं ने बाँटे सबके कर्म , सभी के धर्म, सभी के पन्थ।। 51।।
रच दिये ब्रह्राा-विष्णु-महेश, रचे तुमने ही देवी देव।
तुम्हारे हेतु विष्णु अवतार , बन गये तुम्हीं स्वयं भूदेव।। 52।।
तुम्हीं ने जन-मानस के मध्य , भर दिया ऊँच-नीच का भाव।
स्वयं को लिखकर सबका पूज्य , अन्य से किया सदैव दुराव।। 53।।
शूद्र के सब मौलिक अधिकार , छीनकर शोषण किया असीम।
तुम्हीं ने भरा अंध विश्वास , बताया सदा आम को नीम।। 54।।
भरी तुमने जन-जन में भ्रानित , सुनाकर कथा-भागवत पाठ।
‘ब्रह्रा है सत्य, जगत सब झूठ , सिखाया सोलह दूनी आठ।। 55।।
तुम्हीं ने फैलाया फिर एक , यहाँ पर पूर्व जन्म का रोग।
सह रहे उत्पीड़न-आतंक , मौन रहकर मेहनतकश लोग।। 56।।
तुम्हारे शास्त्रों की ही मान , बन गया राष्ट्र मानसिक दास।
हो चुकी राष्ट्र-चेतना शून्य , हटाना कठिन अंध विश्वास।। 57।।
अगर होता र्इश्वर ही सत्य ,और होता झूठा संसार।
करो तुम क्यों न ब्रह्रा को प्राप्त ,भरों क्यों मिथ्या जग-भण्डार।। 58।।
र्इसार्इ धर्म और इस्लाम , नकारें पूर्व जन्म की बात।
हिन्दुओं की यह शोषण नीति , देश में मचा रही उत्पात।। 59।।
विश्व में हिन्दू-संख्या अल्प , अन्य हैं बहुसंख्यक इन्सान।
धरा पर जन्म-व्यवस्था भिन्न , रची क्या हिन्दू-हित भगवान।। 60।।
अगर पिछले कर्मोवश आज , हुये हैं हम गोरों के दास।
व्यर्थ तब आजादी की क्रानित ,और बलिदान बने बकवास।। 61।।
तुम्हारी शिक्षायें-उपदेश ,बताता भारत का इतिहास।
अगर होता इनमें कुछ तथ्य ,राष्ट्र होता न कभी भी दास।। 62।।
यहाँ पल रहा राजसी तंत्र ,जुड़े सामन्त-पुरोहित-वाद।
करें शोषण, फैला आतंक ,कमेरा वर्ग हुआ बर्बाद।। 63।।
समूचा यह मेहनतकश वर्ग ,दे रहा जीवन-दर्शन-ज्ञान।
सभी के हैं समान कर्तव्य ,परस्पर सब समान इन्सान।। 64।।
सभी के हैं समान अधिकार ,सभी का केवल मानव धर्म।
परस्पर सब संवदनशील ,यही है असली जीवन-मर्म।। 65।।
करूँ शिक्षित मेहनतकश लोग ,सभी जायेंगे जिस दिन जाग।
शूद्र भी उस दिन बने प्रबुद्ध ,उठेगी भड़क क्रानित की आग।। 66।।
धरे रह जायेंगे सब ग्रन्थ , मिटेगा झूठ अन्ध विश्वास।
करवटैं जब बदलेगा शूद्र , राष्ट्र का होगा तभी विकास।। 67।।
गयाजी का उत्तर दो टू, हो गये सुनकर विप्र उदास।
सोचते उत्तर सभी अतक्र्य , लौट कर गये पिता के पास।। 68।।
पुरोहित गये राज-दरबार, जहाँ बौठे थे मौजीराम।
दिया सबने उठकर सम्मान , और फिर सबने किया प्रणाम।। 69।।
विप्र ने कहा– ”आप सामन्त , किन्तु बेटे के तुच्छ विचार।
कमेरों के भरता है कान , कह रहा छीनों सब अधिकार।। 70।।
बताता धर्मग्रन्थ सब झूठ , झूठ है ब्रह्रा, सत्य संसार।
झूठ हैं पूर्व जन्म के कर्म ,बताता ये शोषण हथियार।। 71।।
दे रहा दलितों को उत्साह ,श्रमिक यदि गये जरा भी जाग।
कलंकित होगा सब ऐश्वर्य ,समस्या बने क्रानित की आग।। 72।।
पड़ेगा जब गोरों के कान , आपका पुत्र हुआ गुमराह।
बिखर जायें उनसे सम्बन्ध, आप तब होंगे बहुत तबाह।। 73।।
समस्या बना पुत्र गम्भीर , हर तरह विषम परिसिथति जान।
पिता ने स्वयं पुत्र से बात , अन्तत: करने की ली ठान।। 74।।
एक दिन बोले मौजीराम– ,”पुत्र तुम रहे न अब नादान।
सुशिक्षित हुये डाक्टरी पास ,चल रही है अच्छी दुकान।। 75।।
सुशीला पत्नी भी है प्राप्त , तुम्हें आदर देते सब लोग।
हो गये तुम भरपूर जवान , पड़ा आकर अच्छा संयोग।। 76।।
क्षेत्र में फैला है ऐश्वर्य , हमारी बहुत बड़ी जागीर।
सभी हैं भोग तुम्हें उपलब्ध , तुम्हारी बहुत बड़ी तकदीर।। 77।।
निभाओ अब गृहस्थ दायित्व ,करो कुछ हल्का मेरा भार।
चाहता देना तुमको आज , पुत्र! कुछ सामन्ती अधिकार।। 78।।
कहाँ तक मैं ढोऊँगा भार , हो चुका हूँ शरीर से बूढ़।
मान लो एक हमारी बात ,बताता हूँ रहस्य अति गूढ़।। 79।।
वेदमत, जन-मत कहते सन्त , देव ऋषि-मुनियों का परमार्थ।
कहें कुछ और, करें कुछ और , तभी कर सकें सिद्ध निज स्वार्थ।। 80।।
इसलिए छोड़ों आर्य-समाज, त्याग दो राजनीति की लीक।
पकड़ लो परम्परागत राह , पुत्र! तुम कहते जिसे अलीक।। 81।।
जानते तुम हो भली प्रकार , कि गोराें का है बहुत दबाव।
जान लेंगे यदि तुम गुमराह ,कसेंगे मुझपर और कसाव।। 82।।
पिता का सुन करके उपदेश ,गयाजी के उर उठी उमंग।
संयमित शब्द, गिरा में जोश ,भाव में भरा क्रानित का रंग।। 83।।
”आप सब कहते जिसको सत्य , वही सब अंधी श्रद्धा-मूल।
आप सब स्वार्थ-सिद्धि के हेतु, चुके मानव-मानवता भूल।। 84।।
बिना जाने ही लेते मान , सत्य को झूठ, झूठ को सत्य।
अगर हम करें प्रयोग विवेक , समझ में आये सत्य-असत्य।। 85।।
देश में स्वार्थ-लोभ में अन्ध , कर रहे सब शोषण-अन्याय।
कमेरों-श्रमिकों की तो आज ,जिन्दगी दर्द-पीर-पर्याय।। 86।।
ढोंग-पाखण्ड धर्म के काम ,धर्म के नाम चले व्यापार।
धर्म में भरा अन्ध-विश्वास , बना मेहनतकश अपढ़ शिकार।। 87।।
सभी धर्मों के भिन्न प्रतीक , ढो रहे हैं सब धर्माभास।
सहज जो है मानवता धर्म , हो चुका उसका पूरा àास।। 88।।
दिखाकर स्वर्ग-नर्क का भूत , मचाते मुफ्तखोर हैं लूट।
कमेरों का तो फूटा भाग्य ,लुटेरों को है पूरी छूट।। 89।।
निवेदन करूँ आपसे नम्र ,वक्र मेरे जीवन का मोड़।
टूट सकता, हो सरल न किन्तु ,क्रानित की राह न सकता छोड़।। 90।।
आपकी बहुत बड़ी जागीर ,आप ही रखिये अपने पास।
करूँ नित श्रमिक-चेतना मुफ्त , बने जो रहे मानसिक दास।। 91।।
जमींदारी का कोर्इ भार , नहीं सकता मंै कभी सँभाल।
जन्मत: है स्वभाव प्रतिकूल , इसलिए वचन रहा हूँ टाल।। 92।।
आज सब जमींदार-सामन्त , किये हैं पण्डों से गठजोड़।
साथ मिलकर फिर चूसें खून , कमर श्रमिकों की दी है तोड़।। 93।।
सभी सामन्त पालतू श्वान , करें मालिक-गोरों को पुष्ट।
नहीं हैं जमींदार इन्सान , धरे नर रूप भेडि़या दुष्ट।। 94।।
âदय में उठता यही विचार , करूँ मैं सबसे प्रथम उपाय।
बाद में होवे देश स्वतंत्र, जमींदारी पहले मिट जाय।। 95।।
पुत्र का उत्तर सुन बेढंग , भर गया पितु के उर अति क्रोध।
कहा– ”तू हुआ बड़ा उदण्ड , नहीं है तुझे सत्य का बोध।। 96।।
जिदद का होता दुष्परिणाम , बड़ों की जो न मानते सीख।
ठोकरें दर-दर खातें नित्य , माँगते वे जीवनभर भीख।। 97।।
बिगाड़ेगा घर का महौल , तुम्हारा राजनीति सेे मेल।
लगा दोगे जीवन में दाग , भेजकर तुम मुझको भी जेल।। 98।।
इसलिए है मेरा आदेश , छोड़ दो तुम घर अभी तुरन्त।
शहर जाओ ले पत्नी साथ , जमींदारी का करना अन्त।। 99।।
शहर में रहकर घर से दूर , कमाकर खाना आटा दाल।
छुड़ाना अंग्रेजों से देश ,जलाकर सब में क्रानित मशाल।। 100।।
उसी दिन आ जायेगा होश , बिगड़ जायेगी जिसदिन शक्ल।
उतर जायेंगे सारे भूत , ठिकाने लग जायेगी अक्ल।। 101।।
पिता का जो पहला उपदेश , उसे तो दिया तर्क से टाल।
पिता का जो अंतिम आदेश , उसे स्वीकार किया तत्काल।। 102।।
जहाँ पर तपता कभी न सूर्य , वहाँ पर हो न कभी बरसात।
वहाँ पर रचे न नव इतिहास ,जहाँ पर हो न क्रानित की बात।। 103।।
चले जो शूलों की ही राह ,मिले उसको फूलों का हार।
वरण कर ले जो बढ़कर मौत ,उसे ही जीने का अधिकार।। 104।।
साधने हित जीवन का लक्ष्य ,पड़े करना पग-पग संघर्ष।
अँधेरे को धिक्कारें व्यर्थ, जले खुद बनकर दीप सहर्ष।। 105।।
कभी भी रुकें न गति के पाँव , सहेें वर्षा-हिम-आतप-वात।
जिन्दगी में न कभी ठहराव ,झमेले झेेलें झंझावात।। 106।।
गयाजी करते सतत विचार , बैठते थे जब कभी सुचित्त।
छोड़ना पड़ता घर-परिवार , किसी दिन सच्ची क्रानित निमित्त।। 107।।
बहाना बना ‘पिता-आदेश , चल दिये शहर तुरत घर छोड़।
झाँक पाया है कौन भविष्य , कहाँ-कब-कैसे जीवन-मोड़।। 108।।
अचमिभत हुआ सकल परिवार , हुये सब घटना क्रम से दंग।
इस समय चुप थे मौजीराम , नहीं था कहा– ‘बहू लो संग।। 109।।
खड़ी थी रज्जो देवी मौन , समझ पायी न प्रकृति का खेल।
लिये अपनी पुत्री को गोद , विचारों का ताँता अनमेल।। 110।।
सहज बह गयी अश्रु की धार ,उठी थी पति-वियोग की हूक।
किसलिए-कहाँ चले पतिदेव , सोंचकर हुआ âदय दो टूक।। 111।।
एक तो थी घर की मर्याद, दूसरे नारीपन की लाज।
थामकर उस-सागर का ज्वार , नयन ही जीभ बन गये आज।। 112।।
बालिका शिशु माता की गोद , चकित हो देखे चारों ओर।
समझती कुछ न रही अनजान , टूटती पितु-संरक्षण-डोर।। 113।।
गयाजी की माता बेहाल , उठा उर में ममता का ज्वार।
बसा जो मान-मनौती बाद , उजड़ता देखा निज परिवार।। 114।।
पुत्र के लिए मातु-उर-मध्य , भरा था जितना निश्छल प्यार।
वहीं उससे भी बढ़कर स्नेह , बहू के प्रति था भरा दुलार।। 115।।
देखकर बेटा गया प्रसाद , उठी माता के उर में पीर।
बहू को सिसकी भरती देख , नन्दरानी थीं अधिक अधीर।। 116।।
सरल âदया जननी का शोक , असीमित अश्रु कर रहे व्यक्त।
पुत्र के लिए मातु का स्नेह , लिखे कवि नहीं लेखनी शक्त।। 117।।
जब कभी घर में मौजीराम , प्रकट करते बेटे पर क्रोध।
उस समय माता का यह स्नेह , व्यक्त करता था सहज विरोंध।। 118।।
”मरीजों का जमघट हर रोज ,लगा रहता है आठो याम।
किया करता है उनसे बात , नहीं पाता पलभर विश्राम।। 119।।
समय यदि मिला कभी कुछ रिक्त , बैठ यदि गया किसी के पास।
समस्या खड़ी हो गयी कौन , हुआ क्या उसमें अनुचित खास।। 120।।
आपके पास सैकड़ों दास , सैकड़ों सेवक करते काम।
हमारा पुत्र बहुत शालीन , वृथा करते उसको बदनाम।। 121।।
लिया हरदम बेटे का पक्ष , अखरती कभी न उसकी बात।
समस्या से थीं यह अनभिज्ञ , करेगा बेटा क्या उत्पात।। 122।।
लगे जब चलने गयाप्रसाद ,बिलखती मातु देख लाचार।
हो गये वे भी भाव विभोर ,बह चली आँखों से जल-धार।। 123।।
सोंचते मन में मौजीराम– ,”दिया तो था आदेश कठोर।
किन्तु अति दुखप्रद पुत्र-विछोह , तोड़ना कठिन मोह की डोर।। 124।।
शहर में चन्द रोज ही घूम , जगे जब माँ-पत्नी की याद।
विवश कर देगा पुत्री मोह , लौट आयेगा कुछ दिन बाद।। 125।।
देखती रहीं टकटकी बाँध , खड़ी रज्जो पति को चुपचाप।
हुये ओझल तब निकली चींख ,âदय में भरा दुसह संताप।। 126।।
पिता-बेटे में वाद-विवाद,सब कहीं होते इसी प्रकार।
सदा के लिए देश हित किन्तु ,कौन तज देता निज घर-बार।। 127।।

तृतीय सुमन

बह चली लहर शिशिर की शीत , हुआ जब सुखद शरद का अन्त।
प्रकृति ने पहनी चोली भिन्न , हुआ निस्तेज आज दिनकन्त।। 1।।
चतुर्दिशि नभ-थल-जल सब ठौेंर, प्रभावी हुआ शीत-ज्वर आज।
प्रकमिपत सब जड़-चेतन जीव , सभी पर छाया ठण्डक-राज।। 2।।
हो गया हतप्रभ आज दिनेश ,हुआ जब तमसावृत आकाश।
इन्दु इव निष्प्रभ लखकर सूर्य ,हुये सरसिज संकुचित हताश।। 3।।
देखकर अतिशय शिशिर-प्रकोप ,हो गया क्षीण ताप से भानु।
ठण्ड से करने जग का त्राण ,सभी को लगती सुखद कृशानु।। 4।।
छोड़ पावक भी दाह-प्रवृतित ,बन गया मनौ मानसिक दास।
शीत-ज्वर से मानव भयभीत ,सिकुड़ कर बैठा खिन्न, उदास।। 5।।
शिशिर में हिम कण की बरसात , कर रही ऐसा प्रबल प्रहार।
यथा गोरों की काली नीति, करे भारत पर अत्याचार।। 6।।
हुये सब जड़ चेतन अति दीन , शीत-भय से अपनापन भूल।
हुए मानव विवेक से शून्य ,यथा सब मोह-हिंडोला झूल।। 7।।
हो गया छिन्नतार सौंदर्य ,प्रकृति-वधु सिसकी भरे उदास।
मनौ आतंकवाद का दैत्य, आ गया करने यहाँ प्रवास।। 8।।
झर गये पात हुये निष्पर्ण , खड़े सब पादप कानित-विहीन।
यथा विघटित, खणिडत, निष्प्राण ,खड़ा कोर्इ समाज अतिदीन।। 9।।
पल्लवित होते वे ही वृक्ष ,प्रथम झरते है जिनके पात।
प्रगति करता है वही समाज ,सहे जो दृढ़ हो झंझावात।। 10।।
विश्व का सहज भाव है द्वन्द्व , अर्थ है जीवन का संघर्ष।
यहाँ है सुख-दुख, मिलन-वियोग, पराजय-विजय, पतन-उत्कर्ष।। 11।।
जगत है नित परिवर्तनशील , यहाँ सब आदि और सब अन्त।
कभी पतझर का नीरस राग , कभी मधुमय संगीत बसंत।। 12।।
यहाँ पतझर में भी जो फूल , विहँस कर सुनें बसन्ती गान।
कण्टकों की शैया पर नित्य, सुमन जो बिखराते मुस्कान।। 13।।
रखें उपवन का गौरव ध्यान ,उसी को ही निज गौरव जान।
पुप्प जो उपवन की अरमान , सदा समझें अपनी अरमान।। 14।।
उसी के सँग जो करे विलाप , उसी के सँग पाते सम्मान।। 15।।
वही सब सुमन विहँस कर एक , सूत्र में गुँथकर बनते माल
यथा संगठित राष्ट्र के लोग , रखे उन्नत स्वदेश का भाल।। 16।।
आलसी-क्रूर-विलासी व्यकित , भूल जाता है जीवन-लक्ष्य।
मोह में भ्रमित, लोभ में अन्थ ,पुरुष का ध्येय बने दुर्लक्ष्य।। 17।।
किन्तु जो स्वयं सूर्य सा तेज ,देख उसको भग जाता अंध।
स्वयं जो बना काल का काल ,देख उसको न रुके भय-गंध।। 18।।
देखकर साहस जासु अदम्य , संकटों की चादर हो छिन्न।
भला वह जीवन पथ पर पैर ,बढ़ाने में कैसे हो खिन्न।। 19।।
सदा काँटो में खिले गुलाब, पंक में पले सदैव सरोज।
गयाजी दे कष्टों को मात , चल पड़े घर से उर में ओज।। 20।।
उन्हे कुन्दन बनने की साध , अत: चुन लिये कष्ट-अंगार।
बने घिस-घिसकर चन्दन देह , राष्ट्र-पूजा में हो बलिहार।। 21।।
एक तो जलियाँवाला बाग , जहाँ पर मचा विकट कोहराम।
क्रूरता-पशुता ने साकार, किया मानवता को बदनाम।। 22।।
जहाँ वह चली खून की धार , लुट गयी गोद, लुटे सिंदूर।
मृत्यु खुद सहमी लखकर दृश्य , धरा भी दहल उठी भरपूर।। 23।।
प्रकृति ने स्वयं बहाये अश्रु, किया नभ ने भी दुख एहसास।
मुकित-बलिवेदी पर अंग्रेज,रच चुके खूँरेजी इतिहास।। 24।।
गयाजी जिस पल करते याद ,वेदना का होता संचार।
âदय में उठती भाव तरंग , विचारों का आ जाता ज्वार।। 25।।
दूसरे चौरी-चौरा काण्ड,’खिलाफत में किसान थे क्रुद्ध।
हो गयी पुलिस-कृषक मुठभेड़ ,छिड़ गया फिर दोनों में युद्ध।। 26।।
किसानों में था इतना जोश , कि मारे सैनिक-थानेदार।
खबर जब पहुँची गाँधी पास ,’खिलाफत बन्द, मान ली हार।। 27।।
हुयी गाँधी की निन्दा तीव्र,रह गये सहसा सभी हताश।
गयाजी के भी उर में टीस , छोड़ दी कांगरेस से आश।। 28।।
तीसरे बाबाजी के शब्द, हर समय रहते उनको याद।
किस तरह से गोरों ने देश , कर दिया था पूरा बर्बाद।। 29।।
बहाना था केवल व्यापार ,किन्तु वे रहे बहुत चालाक।
देश में रही आपसी फूट,जमा ली तब गोरों ने धाक।। 30।।
हुआ जब प्रथम मुकित-संग्राम ,अगर होता संगठित समाज।
उस समय ही खुल जाते बन्ध , देश रहता परतंत्र न आज।। 31।।
मचा था अन्तर्मन में द्वन्द्व, गयाजी कभी न पाते शानित।
राष्ट्र की मुकित हेतु अनिवार्य, लग रही थी अब उनको क्रानित।। 32।।
क्रानितवीरों का अनुपम संघ , बनी थी रूस-क्रानित आधार।
उसी से जुड़ जाने के हेतु , गयाजी ने तब किया विचार।। 33।।
गये उनसे मिलने तत्काल , व्यक्त कर दिये âदय के भाव।
मिला उनको उत्तर दो टूक, संघ से संभव नहीं जुटाव।। 34।।
”संघ के सभी सदस्य जवान, चल रहे सतत क्रानित की राह।
आप कर सकें न पूरी शर्त , क्योंकि हो चुका आपका ब्याह।। 35।।
छोड़कर हम सब घर-परिवार ,हथेली पर रखकर निज प्रान।
शीश पर कफन बाँध हम लोग ,चले हैं करने को बलिदान।। 36।।
हो गये तब चिन्तन में लीन ,गयाजी करने लगे विचार।
”करूँ जाकर रज्जों से बात , अगर वे कर लेती स्वीकार।। 37।।
त्याग दूँगा अपना घर-बार , नहीं फिर बाधक बने विवाह।
तुरत बनकर मैं संघ-सदस्य ,चलूँगा सतत क्रानित की राह।। 38।।
चल पड़े गया प्रसाद तुरंत ,सँजोये क्रानितवीर की साध।
पहुँच कर माँ को किया प्रणाम , भरा जिसमें वात्सल्य अगाध।। 39।।
किया रज्जो ने अ्रति सम्मान , नहीं थे घर में मौजीराम।
भरा गया सबके उर उल्लास , झूमने लगा खजूरी ग्राम।। 40।।
जानता कौन भला यह तथ्य , आखिरी मिलन रहा अज्ञात।
बुलाकर रज्जो को एकान्त, लगे कहने मन की सब बात।। 41।।
”जिन्दगी और मृत्यु के मध्य , अडिग है बना क्रानित का ध्येय।
‘कराना भारत को आजाद, यही बस साध, यही बस प्रेय।। 42।।
जिन्दगी जीते यों तो लोग, अधिकतर खा-पी बच्चों संग।
जिस तरह सब पशु-पक्षी-कीट, जी रहे हैं जीवन बेढंग।। 43।।
किन्तु मानव-जीवन है श्रेष्ठ , खींचता वह नित नूतन लीक।
उसी के उर में भाव प्रदीप्त , जानता वह ही ठीक-अठीक।। 44।।
त्यागकर सभी संकुचित भाव , स्वार्थ-सुख और व्यकितगत कर्म।
चेतना अपनी करके मुक्त, नित्य अपनाये मानव धर्म।। 45।।
प्रिये चूल्हा-चक्की सब आज , रहा हूँ अपने घर की तोड़।
जगाकर किन्तु राष्ट्र-चैतन्य , समूचा देश रहा हूँ जोड़।। 46।।
जले जब सतत क्रानित की ज्वाल , गलेंगे भेद-वृतित-हिम-खण्ड।
दासता भगे, बनें खुशहाल , जलें सब चूल्हे तभी अखण्ड।। 47।।
तुम्हारा या पुत्री का मोह, नहीं सकता है मुझको रोक।
वरण कर ली है मैंने क्रानित , इसलिये करना कभी न शोक।। 48।।
बनूँगा या तो गोली-लक्ष्य , सजा में होगी अथवा जेल।
पोंछ डालों अपना सिन्दूर , क्योंकि अब होगा पुन: न मेल।। 49।।
सुने जब क्रानितवीर के शब्द , हो गये सारे सपने चूर।
लग रही थीं रज्जो निस्तब्ध , मूर्तिवत मात्र रही थीं घूर।। 50।।
बोलने में थी वह असमर्थ , तुरत बह चली अश्रु की धार।
âदय में उठी हूक अरु पीर , उठा मन में भावों का ज्वार।। 51।।
पिता-माता की करके याद , गया था उनका धीरज टूट।
सोंचती थी- ”विधना है क्रूर , हमारा भाग्य गया है फूट।। 52।।
मातु ने क्या इस दिन के हेतु , कराया था मुझको पय-पान।
पिता ने भी क्या इसी निमित्त, किया था मेरा कन्यादान।। 53।।
ब्याह क्या इसीलिए है सत्य , बताते सब पावन गठ-बन्ध।
सिखाते क्या यह ही सब शास्त्र , धर्ममय पति-पत्नी सम्बन्ध।। 54।।
टेंरती है अबला भगवान,परिसिथति सब मेरे प्रतिकूल।
अगर हो सर्वशकित सम्पन्न,बदल दो पति मेरे अनुकूल।। 55।।
नहीं, सब कुछ वास्तव मेंं झूठ, झूठ है भाग्य, झूठ भगवान।
झूठ है गठबंधन का ढोंग, झूठ है ज्योतिष का सब ज्ञान।। 56।।
रहा जब छतितस गुण का मेल, बताया क्यों न गया भवितव्य।
बँधे अब कैसे दिल को धीर , भोगना है जीवित वैधव्य।। 57।।
सोंचती यह सब रज्जों मौन ,निकलते नहीं किन्तु थे बैन।
सिसकियाँ व्यक्त करें उर-दाह , नीर बरसाते दोनों नैन।। 58।।
गयाजी खड़े रहे कुछ देर , सोंचते मन में अपने आप।
‘हुआ रज्जो को कष्ट महान, इसलिए करती सहज विलाप।। 59।।
कहा पत्नी से हो गम्भीर ,”तुम्ही ने किया प्रथम संकल्प।
करोगी पग-पग पर सहयोग ,आज क्यों आँसू बने विकल्प।। 60।।
लिया अपने को तुरत सँभाल , प्रश्न सुनकर पति का गम्भीर।
सहज होकर बोली तत्काल , âदय में आदर-दृढ़ता-धीर।। 61।।
”आप ही नित मेरे आदर्श , आप को दिया सदा सम्मान।
आप ही मेरे जीवन-मूल्य , आपही देह, आप ही प्रान।। 62।।
नहीं तोडूँगी वह संकल्प , निभाऊँगी जीवन पर्यन्त।
मुझे पतक्षर रहना स्वीकार, आप नित रहें प्रफुल्ल बसन्त।। 63।।
राष्ट्र-हित में करती हूँ दान , आज जीवन का पूरा कोष।
आप की रहे चेतना मुक्त , आपको मिले सदा सन्तोष।। 64।।
छोड़ मेरा-पुत्री का मोह , जगाना सकल प्रसुप्त समाज।
बनाकर दृढ़ संकलिपत संघ , मिटाना परकीयों का राज।। 65।।
पटाकर ऊँच-नीच के खडु , हटाना छुआछूत के भाव।
काटकर भेद-वृतित का मूल , उगाना पौध प्रेम सदभाव।। 66।।
हटाकर ढोंग-अंध विश्व, भगाना जन-गण-मन की भ्रानित।
जगाकर समता मूलक भाव ,रचा देना सामाजिक क्रानित।। 67।।
जा रहे हो तो जाओ कन्त ,निभाना वचन रहे नित याद।
देखना मुड़कर नहीं कदापि,मोह-बन्धन से हो आजाद।। 68।।
मात्र इतना कह रज्जों देवि , माँग का पोंछ दिया सिंदूर।
गयाजी होकर बन्धन मुक्त , चल पड़े साहस से भरपूर।। 69।।
छोड़कर राग-मोह-ऐश्वर्य, उमड़ता âदय-पयोधि अगाध।
बढ़ चले क्रानित-पंथ पर पैर ,सँजोये स्वतंत्रता की साध ।। 70।।
उठ पड़ी अविरल भाव-तरंग ,लगी टकराने जाकर कूल।
किया मंथन-चिन्तन गम्भीर, निकाला निर्णय फिर अनुकूल।। 71।।
‘देखकर प्रात: उगता भानु, दासता-निशि-तम हो ज्यों लुप्त।
जगाती है त्यो क्रानित समाज , मोह-संशय-निद्रा में सुप्त।। 72।।
करें दृढ़ क्रानितवीर संकल्प , प्राप्त करना है जीवन-ध्येय।
लक्ष्य-हित वरण करे वह मृत्यु , यही है प्रेय, यही है श्रेय।। 73।।
नित्य जो अपकर्षों की राह , उसे उत्कर्ष दिशा में मोड़।
और व्यवधानों की चटटान, सदा संकल्प-खडग से तोड़।। 74।।
आत्म पौरुष, सदबुद्धि, विवेक , असम्भव को भी करें यथार्थ।
मिटा देता शोषण-अन्याय, यही मानव-जीवन-सत्यार्थ।। 75।।
राह में उठे यही सब भाव , पहुँच फिर गये कानपुर आप।
बन गये संघ-सदस्य तुरंत , मिटा तब उनके उर का ताप।। 76।।
जुड़ गये क्रानित संघ के साथ , जगाने सोया हुआ समाज।
समर्पित करके जीवन पुष्प , देश में लाने हेतु स्वराज।। 77।।
वहाँ उनके हमराही मित्र ,रहे शिव वर्मा, विजय कुमार।
मिले थे पाण्डे सुरेन्द्रनाथ ,और थे भगतसिंह सरदार।। 78।।
हुआ फिर शेखर का भी साथ ,वहीं मिल गये मित्र जयदेव।
मिले थे जयगोपाल भी मित्र ,क्रानित-पथ के राही सुखदेव।। 79।।
गयाजी क्रानितकारियों संग , जलाते फिरते क्रानित-मशाल।
देख संगठन कार्य-विस्तार , बिछ गया गुप्तचरों का जाल।। 80।।
एक दिन मिला गुप्तचर एक , गयाजी से बोला-”चल साथ।
कर रहा तू सरकार-विरोध ,आज फँस गया रंगे ही हाथ।। 81।।
मूलधन को पटका तत्काल ,पीटकर उसे चुकाया ब्याज।
गयाजी बोले-”दूँगा छोड़, खोलना किन्तु न इसका राज।। 82।।
बुद्धि उनकी थी प्रत्युत्पन्न, आँक लेते घटना-वैषम्य।
काल से भी वे थे निर्भीक , âदय में साहस भरा अदम्य।। 83।।
क्रानित-पथ पर चलने के बाद , कर लिया कष्टों का सहवास।
क्षुधा की तृपित कभी अति सूक्ष्म, कभी तो पूरा दिन उपवास।। 84।।
जिन्दगी हित जितना अनिवार्य , किया नित उतना ही आहार।
जिन्दगी है खाने के हेतु, न सोचा कभी एक भी बार।। 85।।
अहर्निशि जन-मानस के मध्य, क्रानित का बीज बो रहे रोज।
डालकर राष्ट्र-चेतना-नीर, प्रफुलिलत करते âदय-सरोज।। 86।।
बनी जो जीवन शैली रूढ़, बदलते राष्ट्र-भकित में ढाल।
धधकती मनोभूमि में अगिन , उठे चैतन्य-क्रानित की ज्वाल।। 87।।
जलाकर जन-गण-मन में ज्योति ,भगाते थे जन-मानस-भ्रानित।
संकुचित स्वार्थ, अंधविश्वास,मिटाकर जगा रहे जन-क्रानित।। 88।।
बुन रहे ताना बाना नित्य ,रचाने सतत क्रानित का व्यूह।
सदा थे सक्रिय, सजग, सतर्क, बचाकर शासन के प्रत्यूह।। 89।।
सुदृढ़ था उनके उर विश्वास ,उठेगा जिस दिन जन-जन जाग।
उसी दिन निशिचत गोरे लोग ,जायेंगे देश छोड़कर भाग।। 90।।
उन्हे शीतल लगती थी आग ,पंथ कण्टकाकीर्ण आसान।
रोपकर स्वाभिमान का बीज उगाते राष्ट्र-प्रेम-सम्मान।। 91।।
लगा सन उनीस सौ पच्चीस , क्रानितवीरों ने लूटी रेल।
कहा जिसको काकोरी-काण्ड, निकाला बालू से भी तेल।। 92।।
चाहते क्रानितवीर थे अर्थ, भरा था हर जवान में जोश।
रह गया गोरा शासन दंग , उड़ गये गुप्तचरों के होश।। 93।।
चलाया गया दमन का चक्र, रही थी क्रूर-घिनौनी चाल।
घिरे उत्पीड़न के घन घोर , हुआ पर तनिक न बाँका बाल।। 94।।
हुआ तब तक बम का विस्फोट , नगर लाहौर बीच बाजार।
हुये घायल जिसमें कुछ लोग ,रही दोषी गोरी सरकार।। 95।।
प्राप्त कर शासन से संदेश, पुलिस ने स्वयं दिये बम डाल।
धमाका सुनकर जो जिस ठौर , वहीं पर दहल गया तत्काल।। 96।।
किया शासन ने झूठ प्रचार , क्रानितवीरों का गर्हित काम।
हो गयी उनसे जनता रुष्ट, हुये सब क्रानितवीर बदनाम।। 97।।
किये कुछ गये क्रानितवर कैद , और कुछ हुये बहुत पामाल।
किन्तु कुछ मिला न दोष-प्रमाण, अत: सब छूट गये तत्काल।। 98।।
और जब थोड़े दिन के बाद , हुआ शासन का भण्डाफोड़।
उसी क्षण क्रानितकारियों संग , किया जनता ने फिर गठजोड़।। 99।।
गयाजी रहते सदा सतर्क, बदलते रहते अपना नाम।
दवा से हो जाता धन-लाभ, उसी से करें क्रानित का काम।। 100।।
लगाकर अपना साइनबोर्ड, दवाखाना लेते थे खोल।
रोगियों में बातों ही बात , क्रानित का रँग देते थे घोल।। 101।।
दवाखाने का बाहर दृश्य , गयाजी करें रोग से त्राण।
उसी घर में छिपकर प्रणवीर , किया करते थे बम निर्माण।। 102।।
उन्हें जब हो जाता अनुमान , भेद सब जान गयी सरकार।
तुरत देते थे वह घर छोड़, क्रानित के बनके अगुवाकर।। 103।।
पूर्ण करने जीवन का ध्येय, बदलते रहते अपना ठाँव।
डालते जन-मानस पर छाप , कभी तो शहर, कभी तो गाँव।। 104।।
गयाजी फिरोजपुर के मध्य ,हुये थे निगम वैध मशहूर।
जिला मंत्री का पद-सम्मान, मिला कायस्थों से भरपूर।। 105।।
वहाँ पर मिला बहुत सहयोग , âदय में फूँक जागरण मंत्र।
दासता को करने निमर्ूल , सिखाते रहे संगठन-तंत्र।। 106।।
गयाजी छदम नाम अरु वेश , रहे नित अभिनय-कला प्रवीन।
जगाते रहे अलख दिन-रात, क्रानित-पथ पर थे रुके कभी न।। 107।।
राजनैतिक सुविधा के नाम ,साइमन आया भारत वर्ष।
कमीशन रहा कपट से पूर्ण ,भर गया सबके âदय अमर्ष।। 108।।
हुआ उसका हर जगह विरोध , हुये थे आन्दोलन सब ठौर।
दमन का चला घिनौना चक्र, दुखद घटनास्थल था लहौर।। 109।।
गूँजता सिंहनाद चहुँओर , ‘साइमन वापस जाओ भाग।
यहाँ अब नहीं गलेगी दाल , पड़ा पंजाब केसरी जाग।। 110।।
बढ़ा आगे तत्क्षण साण्डर्स, किया लाठी से प्रबल प्रहार।
हुआ घायल भारत का लाल , दहाड़ा सिंह हुयी हुंकार।। 111।।
”क्रानित को दमन न सकता थाम , क्रानितवीरों देना मत ढील।
सुनो साण्डर्स, तुम्हारी यषिट , बने गोरे शासन हित कील।। 112।।
हुये लालजी अमर शहीद , राष्ट्रहित करके निज बलिदान।
स्वयं जड़ता सहमी लख दृश्य , बिलखते भारत माँ के प्रान।। 113।।
बुलायी गयी सभा तत्काल , क्रानितवीरों का हुआ जमाव।
सभी के उर में भड़की आग , किया सबने पारित प्रस्ताव।। 114।।
लिया सबने मिलकर संकल्प , ‘हमें अब लेना है प्रतिशोध।
मारकर कुटिल-अधम साण्डर्स, जताना हमको खुला विरोध।। 115।।
गयाजी अति संवेदनशील , मिला जब अटल प्रतिज्ञा-नीर।
पड़ी शीतल अन्तर्मन अगिन ,बह चला नूतन क्रानित-समीर।। 116।।

चतुर्थ सुमन

लिया है जिस धरती पर जन्म , पिया है जिसका पावन नीर।
पले जिसकी गोदी में खेल , मिला जिससे नित प्राण-समीर।। 1।।
जहाँ पर प्रकृति नित्य नव साज , सजाकर बदला करती रूप।
जहाँ जड़ में भी चेतन-भाव , दिव्य सुषमा ऋतु के अनुरूप।। 2।।
जहाँ मेला लगता हर ठौर , मिलेंगे सब प्रतीक-उपमान।
जहाँ पर सतत गूँजती गूँज ,क्रनित-पथ के प्रेरक स्वर-गान।। 3।।
जहाँ पर हुये वीर कुर्बान ,âदय में भरे आत्म विश्वास।
मचलती रही जवानी नित्य ,जहाँ रचने नूतन इतिहास।। 4।।
जहाँ पर स्वयं मौत के फन्द ,विहँसते क्रांनितवीर लें चूम।
जहाँ फाँसी पर चढ़ने हेतु ,वीर गाते जाते थे झूम।। 5।।
उसी धरती से सब कुछ प्राप्त , इसलिए वही कर्म की भूमि।
उसी का वन्दन, उसे प्रणाम , हमारे लिए पुण्य की भूमि।। 6।।
रुदन करती है भारत मातु, रही जो सदियों से परतन्त्र।
निछावर करदें हम सर्वस्व , कराने अपनी धरा स्वतंत्र।। 7।।
हमारा राष्ट्र हमारी भूम, किन्तु कर सकें न हम उपयोग।
कुटिल गोरो के थे हम दास,दासता ही था घातक रोग।। 8।।
दासता से पाने की मुकित सिसकती मानवता को त्राण।
चल पढ़े वीर क्रानित की राह ,हथेली पर रखकर निज प्राण।। 9।।
क्रानित का अर्थ नहीं आतंक ,सदा होता दोनों में भेद।
समझने में न करें हम भूल , कष्ट सहने में करें न खेद।। 10।।
सदा आतंकवाद का अर्थ, शत्रु वह है जो करे विरोध।
परिसिथति, अवसर अथवा स्थान बिना सोंचे करता प्रतिशोध।। 11।।
नहीं उसका उददेश्य महान , करें हत्या का नित्य प्रयास।
नहीं वह नर संवेदनशील , नहीं मानवता में विश्वास।। 12।।
बनता वह जीवन सिद्धान्त , सदा हो सिद्ध संकुचित स्वार्थ।
विरोधी शत्रु सहायक मित्र , सोंचते यही, नहीं परमार्थ।। 13।।
नहीं जिसमें करुणा सदभाव नहीं है मानवपन का ज्ञान।
बहाता जो मानव का रक्त , नहीं हो सकता वह इन्सान।। 14।।
क्रानित आतंकवाद से भिन्न सदा होता उददेश्य महान।
नहीं इसमें हत्या-अवकाश , पूज्य होता इसमें इन्सान।। 15।।
क्रानितकारी का जीवन ध्येय , âदय में हर मानव प्रति प्रीति।
विरोधी नर का भी सम्मान , सदा करना सिखलाती नीति।। 16।।
कभी करता न स्वार्थ की पूर्ति, नहीं करता हत्या-दुष्कर्म।
सोचता सदा राष्ट्र-उत्कर्ष , यही है उसका मानव धर्म।। 17।।
करे जो सकल समाज विपन्न , करे जो सकल राष्ट्र अपमान।
उसी को मानवता का शत्रु , क्रानितकारी भी लेते मान।। 18।।
इसलिए क्रानित शब्द का अर्थ , सदा होता ऐसा बदलाव।
जहाँ पर मानव-शोषण हेतु, न पोषण पाये शोषण-भाव।। 19।।
बदलने पड़ते जीवन-मूल्य , समय से हुये रूढ़-प्राचीन।
सतत मानव-समाज गतिशील, करे निर्धारित नियम नवीन।। 20।।
जहाँ पर ऊँच-नीच के खडु , पाटकर भग जाता बिखराव।
दूर कर छुआछूत का रोग, जहाँ बढ़ता समरसता भाव।। 21।।
जहाँ पर शासक-शासित भेद , आपसी होते पूर्ण समाप्त।
सभी में बढ़े परस्पर प्रेम , सभी करते हैं आदर प्राप्त।। 22।।
जहाँ ममता-करुणा-प्रतिमूर्ति, नारि पाती पूरा सम्मान।
जहाँ समता-सामाजिक न्याय , और हों सब शिक्षित इन्सान।। 23।।
सभी को अवसर मिले समान , सभी को खुले प्रगति के द्वार।
सभी में स्वाभिमान की रशिम , जगा दे मानवता से प्यार।। 24।।
तोड़कर सब धर्मों के जाल , रहे कोर्इ न मानसिक दास।
मिटा कर घृणा-र्इष्या-द्वेष , बढ़ायें आपस में विश्वास।। 25।।
सभी का जीवन सुखी समृद्ध , समूचा राष्ट्र बने खुशहाल।
इसलिये हुयी क्रानित अनिवार्य, देखकर जनमानस बदहाल।। 26।।
सरल है नहीं क्रानित का पन्थ, किन्तु जिनके उर गहरी साध।
वही तो इन्कलाब का ध्येय, प्राप्त कर लेते हैं निर्बाध।। 27।।
âदय में पैदा करती टीस , शहादत लाला जी की रोज।
सभी ने बदला लेने हेतु , निकाला अच्छा अवसर खोज।। 28।।
वृथा लगते थे धर्म-प्रतीक , भगतसिंह को न रहा विश्वास।
धरा पर सब मानव कृत धर्म, मानते थे वे धर्माभास।। 29।।
अनीश्वरवादी रहे विचार , भगत का दर्शन पूर्ण अखण्ड।
सहज देते थे ऐसे तर्क , कि होता खण्ड-खण्ड पाखण्ड।। 30।।
भगत ने मन में किया विचार , केश कटवाने का प्रस्ताव।
क्योंकि बदला लेने के बाद , अन्यथा होता कठिन बचाव।। 31।।
गयाजी ने क्लीनिक में गुप्त , रूप से काट दिये सब केश।
भगत की हुयी कठिन पहचान , हो गये छदमवेश में पेश।। 32।।
क्रानितवीरोें ने की तैयार, योजना पक्की नूतन ढंग।
चल पड़े भगतसिंह सरदार , राजगुरु भी थे उनके संग।। 33।।
बने थे मुखवर जय गोपाल , मिला संकेत न की थी देर।
तुरत तड़-तड़ गोली-बौछार, हुआ साण्डर्स वहीं पर ढेर।। 34।।
तहलका मचा, मची भगदौड़, सुरक्षित बच निकले प्रणवीर।
हुयी हतप्रभ गोरी सरकार , गुप्तचर व्याकुल हुये अधीर।। 35।।
खड़े थे उनके सम्मुख प्रश्न , भरा था सबके उर में खेद।
पुलिस थाने पर घटित कुकृत्य , किन्तु कुछ जान न पाये भेद।। 36।।
हुआ क्यों, कैसे यह अपराध, और हत्या का दोषी कौन?
प्रश्न तो खड़े हो गये तीन , किन्तु उनके उत्तर सब मौन।। 37।।
निशा-अवसान हुआ जब प्रात , रही थी खूनी स्याही बोल।
हुये गोरे सत्ता-मद अंध , रहे थे पत्रक आँखे खोल।। 38।।
लिखा था पचों में यह साफ-, ”हुआ लालाजी का बलिदान।
अधम, अन्यायी था साण्डर्स, किया भारत माँ का अपमान।। 39।।
उसी का ही है यह परिणाम , कि धोना पड़ा जान से हाथ।
यही हो सब गोरों का हाल , छेड़खानी की सिंहों साथ।। 40।।
समझ लो आँख कान स्रब खोल, करें शोषक शासक मि्रयमाण
शिवा-राणा का अब भी खून , ज%